वो सूखा पेड़ -
अभिशप्त सा जड़वत खड़ा ,
टकटकी बांधे, इंतजार में -
कि कब आएगा कोई ,
मरुभूमि से पृथक करने
मेरे इस सूखे शरीर को ,
बोझिल सा खड़ा ,
सोचते अपने अतीत को ,
हरित प्रफुल्लित शाखाओं पर -
जब कोयल कलरव करती थी,
माधुर्य फलित उन पोल्हों पर-
जब सब खग गोंदें चुंगते थे ,
तीक्ष्ण पवन व बहु-वृष्टि पर -
जब कपि भी तन को ढकते थे ,
वो आनंदमयी संसार अब
कालजयी भर रह गया ,
वीक्षीप्त खड़े इस बीयाबान में-
निस्प्राय सदिश बस रह गया,
प्रकृति का दोष कहूँ इसे या -
मानव की ये उत्पीड़नता ,
अति-वृष्टि का कारण क्या है -
मै तो नही समझ सकता ,
मेरे सूखे इस तन सा -
बस हाल न हो इस मानव का,
हरी भरी पावन धरती से -
विक्षोभ ना हो इन मेघों का ,
इन्ही विचारों में तत्पर -
इन्द्र दया की अभिलाषा कर,
अपने कटने की प्रतीक्षारत
निर्जीव खड़ा वो सुखा पेड़ !!!
शुक्रवार, 31 जुलाई 2009
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